Sunday, April 18, 2010
बदलते वक़्त का ...
बदलते वक़्त का इक सिल _सिला सा लगता है
के जब भी देखो उसे दूसरा -सा लगता है ,
तुम्हारा हुस्न किसी आदमी का हुस्न नहीं
किसी बुज़ुर्ग की सच्ची दुआ सा लगता है ,
तेरी निगाह को तमीज़ रंग -ओ -नूर कहाँ
मुझे तो खून भी रंग-ऐ -हिना सा लगता है ,
दमाग - ओ -दिल हों अगर मुतमईन तो छाओं है धूप ,
थपेड़ा लू का भी ठंडी हवा सा लगता है ।
(मुतमईन - content/ satisfied)
- Manzar Bhopali
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