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Thursday, April 23, 2026

अरमानों की कोई हद नहीं

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले 

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

— मिर्ज़ा ग़ालिब


पहला मिसरा —

"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले"

मेरे मन में हज़ारों चाहतें हैं — और हर चाहत इतनी गहरी है, इतनी तीव्र है, कि उसके लिए जान दे दूँ। "दम निकले" यानी — साँस निकल जाए। प्राण निकल जाएँ। यानी हर एक ख्वाहिश जानलेवा हद तक ज़रूरी है।

दूसरा मिसरा —

"बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले"

और जब वो चाहतें पूरी हुईं — तो हुईं भी बहुत। ज़िंदगी ने दिया भी। लेकिन फिर भी — कम लगा। तृप्ति नहीं आई। मन और माँगता रहा।

ग़ालिब यहाँ इंसानी मन की एक सच्चाई कह रहे हैं — कि हम जितना पाते हैं, उससे ज़्यादा चाहते हैं। पाना और चाहना — दोनों साथ चलते हैं, कभी बराबर नहीं होते।

घर का रास्ता

रात भर का मेहमान हूँ, ऐ चाँद जानता हूँ मैं 

एक उम्र से हूँ बाहर, घर का रास्ता जानता हूँ मैं

— गुलज़ार

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Salem की आख़िरी रात - थोड़ी देर और, फिर वो रास्ता जो हमेशा याद रहता है।

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I passed out of Amity Business School, Lucknow in 2006. Twenty years later, on 5 October 2026, I was back on the same campus. This time I wa...