रात भर का मेहमान हूँ, ऐ चाँद जानता हूँ मैं
एक उम्र से हूँ बाहर, घर का रास्ता जानता हूँ मैं
— गुलज़ार
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Salem की आख़िरी रात - थोड़ी देर और, फिर वो रास्ता जो हमेशा याद रहता है।
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले — मिर्ज़ा ग़ालिब पहला मिसरा — "हज़ारों ख...
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